Thursday, July 30, 2009

टूटते तारे

आता है चंद्रमा , कहता कुछ मुझसे है ..
आते हैं तारे, चाहते कुछ मुझसे है..
फिर आई रात, कुछ खुश सी यह मुझसे है,
इनका है कहना, अपनों के संग तुम्हे है रहना,
| अलग न होना परिवार से, विनती बार बार है |

हमारा अपना परिवार है,
रातें भी गुलज़ार है ,
एक नदी हैं हम .... अकेले मझधार है,
एक साथ जगमगाते हम..किसकी मज़ाल है ?
| अलग न होना परिवार से, विनती बार बार है |

अपने तो अपने ही होते हैं,
दूसरो के अपने तो सपने होते हैं ,
दूसरो के अपनों से जो रिश्ता गहराया ,
उसी पल अपनों से रिश्ता सिम्टाया ,
बात जान लो ऐ मेरे मित्र..
अपनों से बढ़ कर अपना नहीं दूजा कोई भी पराया |
| अलग न होना परिवार से, विनती बार बार है |


बंधन टूटे , टूटे रिश्ते और नाते .
एक बार जो छोड़ गया, न बन पाए फिर से वह सितारा,
बिखर जाता वो फिरता रहता मारा-मारा,
शून्य हो जाता अंत में ,ये किसकी आँख का था तारा ?

| अलग होना परिवार से, विनती बार बार है |

8 comments:

stephanie said...

LOVE IT:) its really good

Anonymous said...

Very nice.. you're quite professional now.. :)

Excellent.

Sheyansh said...

Dhanyavaad bhai :) . aap sab ki kripa hai.

apurva said...

wat a great thinking of mind

Natália said...

poem writer, poem writer... I like this one specially, don't know why.
I will analyse the poem another time later, to understand better and better.
Keep writting, talented friend :)

Sheyansh said...

thanks apurva
thanks Natalia :)

All you friends, and my family and emotions towards you all are the motivation for me to write the poems.
thanks for the blessings...yours Swap.

Shreyas said...

Very emotional one. nice work :)

Sheyansh said...

धन्यवाद भाई :D