आज दिल रुखसत, और आँखें बे-रूखी क्यों हैं!
भीतर के ख्वाब, बाहर के साज़ क्यों हैं,
कि जब सुने श्रोता, वक्ता का अस्तित्व यूँ है,
पर जब कहे वह श्रोता, तब वक्ता भाव शून्य क्यों है,
कि जो श्रोता, वक्ता को बनाने वाला यूँ है,
पर वक्ता के आग़ाज़ ए जज़्बात कुछ यूँ है,
कि श्रोता का कार्य है सुनना, वो भला वक्ता-ए -व्यवसाय में क्यों है?
ये महिमा-भाव, एक भंगिमा-सा क्यों है,
भाव का निखार, मानसिक जुड़ाव से यूँ है,
बात की पहचान है अगर, तो विकर्षण ये क्यों है,
आज तो गुप्त पहचान ही, समय की मांग यूँ है,
जज्बातो को ज़ाहिर करने का, ये ज़ायरा क्यों है,
अनभिज्ञ गुप्त पहचान भागते हुए मृग-सी यूँ है,
कि ज्यों-ही अदृश्य ये मृग, मृग-मरीचिका सी क्यों है,
कि करना ही क्या ऐसा, जो जज़्बात ए ज़ाहिर,
अजीज से करो, ना कि किसी भी गुप्त-ए-काफ़िर,
जो न करे तुम्हारा उपहास, न आज न आखिर,
जो समझने का न करे ढोंग ऐसा वो मुलाजिम,
इबादत करे जो तुम्हे, न कि तुम्हारे वस्त्रादि,
जो दिखे अनंत तक, न अंत न अनादि,
पर इस वक्ता की आँखें केवल सुनने वाले श्रोता को ढूंढने में व्यस्त क्यों है??

